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21. प्रभु येशु उपदेश देते हैं

(लूका 6:20-38, 41-42)

येशु जी ने अपने शिष्यों को देखकर कहा,

“धन्य हो तुम जो गरीब हो, क्योंकि परमात्मा का राज्य तुम्हारा ही है।

धन्य हो तुम जो अभी भूखे हो, क्योंकि तुम संतुष्ट किये जाओगे।

धन्य हो तुम जो अभी रो रहे हो, क्योंकि तुम हंसोगे।

धन्य हो तुम जब मेरे वजह से लोग तुम्हारे साथ नफरत करें, तुम्हारा विरोध और बेइज्जती करें, और तुम को बदनाम करके निकाल दें। उस दिन खुश होना और आनंद मनाना, क्योंकि इसके बदले परम स्वर्ग में तुम को बड़ा इनाम मिलेगा! उनके पुरखों ने भी परमात्मा के सेवकों के साथ ऐसा ही किया था।

पर हाय तुम्हारे लिये जो तुम अमीर हो, क्योंकि तुमने अपनी सुख-शांति पा ली है।

हाय तुम्हारे लिये जो संतुष्ट हो, क्योंकि तुम भूखे रहोगे।

हाय तुम्हारे लिये जो अभी हंस रहे हो, क्योंकि तुम दुःखी होंगे और रोते रहोगे।

हाय तुम्हारे लिये जब लोग तुम्हारी बड़ाई करते हैं, क्योंकि उनके पूर्वज भी झूठे सेवकों के साथ ऐसा ही करते थे।

मैं तुमसे ऐसा कहता हूं कि अपने दुश्मनों के साथ भी प्रेम करो। जो तुम्हारे साथ दुश्मनी करते हैं, उनके लिये भलाई करो।

जो तुम को श्राप देते हैं उनको आशीर्वाद दो, जो तुम्हारे साथ बुरा व्यवहार करते हैं, उनके लिये प्रार्थना करो।

जो तुम्हारे एक गाल में थप्‍पड़ मारता है, उसको दुसरा गाल भी दे दो।

जो तुम्हारा कोट लूटता है, उसे अपना कुरता भी दे दो। जो कोई भी तुमसे कुछ मांगता है, उसको वह दो। जो तुम्हारी चीज छीनता है, उससे वह वापिस नहीं मांगो।

जैसा व्यवहार तुम दूसरे से अपने लिये चाहते हो, वैसा ही व्यवहार तुम उनके लिये भी करो।

अगर तुम उनके साथ प्रेम करते हो जो तुम्हारे साथ प्रेम करते हैं, तब इसमें तुम्हारी क्या बड़ाई है? क्योंकि पापी, जो प्रभु को नहीं मानते, वे भी अपने प्रेम करनेवालों के साथ प्रेम करते हैं। और अगर तुम उनकी भलाई करते हो जो तुम्हारी भलाई करते हैं, तब इसमें तुम्हारी क्या बड़ाई है? क्योंकि पापी भी ऐसा ही करते हैं। अगर तुम उनको कर्जा देते हो जिनसे वापिस पाने की आशा रखते हो, तब इसमें तुम्हारी क्या बड़ाई है? क्योंकि पापी भी पापियों को कर्जा देते हैं कि उनसे फिर उतना वापिस पा लें।

लेकिन तुम अपने दुश्मनों के साथ भी प्रेम करो, उनकी भलाई करो और वापिस पाने की आशा नहीं रख कर कर्जा दो। तभी तुम्हारा इनाम भी बड़ा होगा और तुम महान परमात्मा के संतान बन जाओगे, क्योंकि वे भी एहसान-फरामोश और दुष्‍टों में दया करते हैं।

दयावन्‍त बनो जैसे परमात्मा, जो परम स्वर्ग में तुम्हारे पिता हैं, दयावन्‍त हैं।

दोष न लगाओ, तब तुम में भी दोष न लगाया जाएगा। किसी के खिलाफ फैसला न करो, तब तुम्हारे खिलाफ भी फैसला न किया जाएगा। माफ करोगे, तब तुम को भी माफ किया जाएगा।”

दोगे, तब तुम को भी दिया जाएगा। दबा-दबा के और पूरी-पूरी नाप से तुम्हारे गोद में डाला जाएगा, क्योंकि जिस नाप से तुम नापते हो, उसी नाप से तुम्हारे लिये भी नापा जाएगा।”

जब तुम को अपनी आँख के लट्ठे का पता नहीं है, तब तुम अपने भाई की आँख के तिनके को कैसे देख सकते हो? जब तुम को अपनी आँख का लट्ठा नहीं दिखायी देता है, तब तुम कैसे अपने भाई से कह सकते हो, “ला, मैं तेरी आँख के तिनके को निकाल देता हूं?” हे कपटी, पहले अपनी आँख के लट्ठे को निकाल, तब तू अपने भाई के तिनके को अच्छे से निकाल सकेगा!”

प्रभु येशु उपदेश देते हैं

मनन और चर्चा करने के लिए कुछ सवाल

1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?

2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?

3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?

4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?

5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?

येशु सत्संग