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35. धर्म गुरु प्रभु येशु की परीक्षा लेते हैं

(मरकुस 8:11-21, मत्ती 16:12)

तब धर्म गुरु आकर येशु जी के साथ बहस करने लगे। येशु जी की परीक्षा लेने के विचार से उन्होंने कहा, “तुम हमारे लिये कोई भी चमत्कार का काम करो जिससे हम जान सकें कि तुम परमात्मा के पुत्र हो या नहीं हो!” येशु जी ने लम्बी सांस लेकर कहा, “तुम चिन्ह क्यों मांग रहे हो? मैं सच कहता हूं, कि कोई भी चिन्ह नहीं दूंगा।”

येशु जी धर्म गुरुओं को छोड़कर शिष्यों के साथ समुद्र के उस पार के किनारे में चले गये। शिष्य नाव में खाना ले जाना भूल गये थे और उनके पास एक रोटी के अलावा और कुछ नहीं था। येशु जी ने उनको सावधान करने के लिये कहा, “धर्म गुरुओं की खमीरी रोटी को देखकर होशियार रहो।”

शिष्यों ने यह सोचा कि हमारे पास खाना नहीं है, इसलिये यह ऐसा कह रहे हैं।

येशु जी ने उनकी बात सुनी और निराश होकर उनसे कहा, “तुम्हारे पास रोटी नहीं है कहकर तुम परेशान क्यों हो रहे हो? क्या तुम अभी तक नहीं समझे, क्या तुम्हारे पास बुद्धि नहीं है? क्या तुम आँखें होने के बाद भी देख नहीं सकते है, और कान होते हुए भी नहीं सुनते हो? क्या तुमको याद नहीं है कि जब मैंने पाँच हजार लोगों के लिये पाँच रोटियों के टुकड़े करे, तब तुमने कितनी बची टोकरियाँ जमा करीं?” उन्होंने कहा, “बारह टोकरी।” “और जब मैंने चार हजार के लिये सात रोटी के टुकड़े किए, तब तुमने रोटी के टुकड़ों से भरे कितने टोकरे उठाये?” उन्होंने कहा, “सात।” तब येशु जी ने उनसे कहा, “तुम अभी भी नहीं समझे?”

तब शिष्यों को समझ आया कि येशु जी ने उनको खमीरी रोटी से नहीं बल्कि धर्म गुरुओं की सीख से सावधान रहने के लिये कहा।

मनन और चर्चा करने के लिए कुछ सवाल

1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?

2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?

3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?

4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?

5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?

येशु सत्संग