(मरकुस 4:21-34)
फिर येशु जी ने उनसे कहा, “लोग इसलिये बत्ती नहीं जलाते कि उसे जलाकर चारपाई के नीचे रखें या किसी भी बरतन से ढक दे, बल्कि इसलिये जलाते हैं कि उसे ऊंचे स्थान पे रखें जिससे सारे अंधेरे में उजाला हो जाये। सभी जो अभी छिपा-छिपाकर रखा है, वह समय आने पर सामने आयेगा। जो तुम अभी नहीं समझ रहे हो, समय आने पर समझ जाओगे। इसे सुनो और सीख लो।
तुम परमात्मा की बात को जितना भी सुनते हो, उसे ध्यान से सुनो और समझो, क्योंकि अगर तुम समझने की कोशिश करोगे तब तुमको और अधिक समझने की शक्ति दी जायेगी। क्योंकि जिसके पास समझने की शक्ति है, उसको और मिलेगी, और जिसके पास नहीं है, उससे वह भी ले ली जायेगी, जो उसके पास है।”
फिर येशु जी ने लोगों से कहा, “मैं तुम को परमात्मा के राज्य के बारे में एक दूसरा किस्सा सुनाता हूं। परमात्मा का राज्य उस आदमी की तरह है जो भूमि में बीज बोता है। वह रात-दिन सोता-उठता रहता है और दूसरी ओर भूमि में बीज उगता है। वह इसके बारे में कुछ नहीं जानता कि यह सब कैसे हो रहा है। भूमि अपने आप फसल पैदा करती है, पहले अंकुर फिर बाल और फिर जाकर बाल में पक्के बीज। और तब वह आदमी फसल को काटने लग जाता है, क्योंकि काटने का समय हो गया है।”
फिर येशु जी ने कहा, “परमात्मा का राज्य एक राई के बीज की तरह है। जब उसे धरती में बोया जाता है, तब वह सारी धरती में सब से छोटा बीज होता है। पर बोये जाने के बाद जब वह उगता है, तो सब से बड़ा पौधा हो जाता है और उसकी टहनियाँ इतनी बड़ी हो जाती हैं कि उसमें आकाश के पक्षी अपना घोंसला बना सकते हैं।”
येशु जी ऐसे ही बहुत किस्सों के जरिये से लोगों को उनकी समझ के हिसाब से परमात्मा के वचन सुनाते थे। वे बिना किस्सों के जरिये किसी से कुछ नहीं कहते थे पर एकांत में अपने शिष्यों को सब किस्सों के अर्थ अच्छी तरह समझा देते थे।
1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?
2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?
3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?
4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?
5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?