(मरकुस 6:30-44)
फिर येशु जी के शिष्य गाँवों में प्रचार करने के बाद येशु जी के पास आये। और वे येशु जी को बताने लगे कि हमने क्या क्या किया और सीखा।
लेकिन वहां आने-जाने वालों की इतनी भीड़ जमा हो रही थी कि उनको खाना खाने का मौका भी नहीं मिल रहा था। यह देखकर येशु जी ने अपने शिष्यों से कहा, “इस भीड़-भाड़ वाली जगह से कहीं शान्त जगह में चलो, वहां आराम करोगे।” इसलिये वे नाव में बैठकर सुनसान जगह चले गये।
लेकिन बहुत लोगों ने उनको जाते देखा। तब वे समझ गये कि वे कहां जा रहे हैं, तब और लोग दौड़कर उनसे पहले वहां भी पहुंच गये।
येशु जी ने नाव से उतरते ही वह बड़ी भीड़ फिर देखी, और उन लोगों को देखकर येशु जी को उन पर दया आ गयी, क्योंकि वे बिना चरवाहे की भेड़ जैसे थे। इसलिये उन्होंने उनको बहुत बातें बताईं।
जब शाम होने लगी, येशु जी के शिष्यों ने उनके पास आकर कहा, “यह जगह बहुत सुनसान है। अंधेरा भी होने लगा है। अभी आप इन लोगों से कह दो कि ये आस-पास के गाँवों में जाकर अपने लिये थोड़ा खाना मोल ले लें।”
यह बात सुनकर येशु जी ने उनसे कहा, “तुम इन लोगों को खाना दो!” तब शिष्यों ने येशु जी से कहा, “कहां से खिलाएँ, हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं।” येशु जी ने शिष्यों से पूछा, “लोगों के पास कितनी रोटी हैं? जाकर मालूम करो।” उन्होंने पूछकर बताया, “पाँच रोटी और दो मछली हैं।”
फिर येशु जी ने शिष्यों को सब को बैठाने की आज्ञा दी। लोग सौ-सौ और पचास-पचास की पंक्ति बनाकर बैठ गये। येशु जी ने वे पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ पकड़ी, और स्वर्ग की ओर देखकर आशीष मांगी। उसके बाद उन्होंने रोटी और मछलियों को तोड़ा और शिष्यों को देते रहे, कि वे लोगों को दें। इस प्रकार उन्होंने पाँच हजार से अधिक लोगों को खाना खिलाया। और उन सब ने पेट भर के खाना खाया, और उसके बाद फिर भी शिष्यों ने रोटियों और मछलियों के बचे टुकड़ों से भरी बारह टोकरियाँ संभालीं।
1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?
2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?
3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?
4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?
5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?