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31. प्रभु येशु शुद्ध और अशुद्ध के बारे में समझाते हैं

(मरकुस 7:1-23)

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यहूदी धर्म गुरु और सब दूसरे यहूदी भी तब तक खाना नहीं खाते थे, जब तक कि वे एक विशेष तरीके से अपने हाथ नहीं धोते थे। लेकिन जब कुछ धर्म गुरुओं ने येशु जी के शिष्यों को बिना उस तरीके से हाथ धोये खाना खाते देखा, तब उन्होंने येशु जी से पूछा, “तुम्हारे शिष्य पूर्वजों की रीति रिवाजों का पालन क्यों नहीं करते? वे अपना खाना बिना हाथ धोये क्यों खाते हैं?”

येशु जी ने उत्तर दिया, “परमात्मा ने अपने सेवक यशायाह के जरिये से तुम्हारे जैसे कपटी लोगों के बारे में कहा था,

“यह मेरा आदर सिर्फ मुंह से करते हैं और इनके मन मुझ से हमेशा दूर है। उनकी आराधना करना व्यर्थ है क्योंकि वे लोगों के बनाये नियमों को ऐसे सिखाते हैं जैसे कि वे मेरे नियम हों।”

तुम भी लोगों के बनाये रीति रिवाजों का पालन करते हो और परमात्मा के हुक्म को टाल देते हो!”

फिर येशु जी ने उनसे कहा, “तुम अपने नियमों को बनाने के लिये परमात्मा के हुक्म को कितनी चालाकी से छोड़ देते हो। क्योंकि परमात्मा ने अपने सेवक मोशेश के द्वारा हमको यह आज्ञा दी कि तुम अपने माता-पिता का आदर करो और यह भी कि जो अपने माता-पिता को बुरा-भला कहता है, वह पक्का मार डाला जाएगा। लेकिन तुम अपने हिसाब से इस आज्ञा के बिल्कुल उल्टा करते हो। जैसा अगर कोई आदमी अपने माता-पिता से कहता है कि मैं तुम्हारी कुछ मदद नहीं करूंगा, क्योंकि जो भी मैं तुम को देने वाला था, वह परमात्मा को दूंगा, तब तुम यह अच्छा मानते हो! और यह कर के तुम अपने बनाये रीति-रिवाजों से परमात्मा के वचन को टाल देते हो। ऐसा ही तुम बहुत बातों को करते रहते हो।”

येशु जी ने फिर सब लोगों को अपने पास बुलाकर कहा, “तुम सब मेरी बातों को सुनकर समझ लो। कोई भी खाना जो आदमी खाता है, या उसका कोई भी खाना खाने का तरीका, उसको अशुद्ध नहीं करता, लेकिन जो आदमी में से बाहर आता है, वही उसको अशुद्ध करता है। इसे सुनो और सीख लो।”

फिर येशु जी लोगों को छोड़ कर उस घर में गये जहां वे रह रहे थे। तब उनके शिष्यों ने इन बातों का अर्थ पूछा। तब येशु जी ने कहा, “क्या तुम भी इतने अनजान हो, क्या तुम इतना नहीं समझते कि जो भी खाना बाहर से आदमी के अन्दर जाता है, वह आदमी को अशुद्ध नहीं कर सकता है? क्योंकि वह लोगों के मन में नहीं बल्कि उनके पेट में जाता है और संडास से बाहर आ जाता है।” ऐसा कहकर येशु जी ने सब खाने वाले चीजों को सही ठहराया।

येशु जी ने फिर कहा, “आदमी के मन से जो बुरी बात-विचार बाहर आता है, वही उसको अशुद्ध करता है। क्योंकि लोगों के मन के अन्दर से बुरे विचार निकलते हैं जैसे कुकर्म, चोरी, खून, कामुकता, लालच, शत्रुता, धोखेबाजी, दुष्टता, जलन, बुराई, घमण्‍ड, अधर्म, मूर्खता। ये सब बुरी-बुरी बातें लोगों के अन्दर से निकलते हैं और वही उनको अशुद्ध करते हैं।”

मनन और चर्चा करने के लिए कुछ सवाल

1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?

2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?

3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?

4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?

5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?

येशु सत्संग