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37. प्रभु येशु बताते हैं कि मैं मारा जाऊँगा

(मरकुस 8:31-38, 9:1)

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फिर येशु जी उनको बताने लगे, “मैं जो परमात्मा की तरफ से आया हूं, मैं बहुत सताया जाऊँगा। धर्म गुरु, पुरोहितों के साहब और प्रधान सब मेरा निरादर-तिरस्‍कार करेंगे, और वे मुझे मार देंगे। लेकिन उसके तीसरे दिन मैं मरे हुओं में से जीवित हो जाऊँगा।” लेकिन यह बात सुनकर पारस उनको एक तरफ लेकर गया और डांट कर कहने लगा, “आप को ऐसा नहीं कहना चाहिए।”

लेकिन येशु जी ने पीछे मुड़कर पारस को फटकार लगाकर कहा, “शैतान, तू मुझ से दूर चला जा, क्योंकि तेरी सोच-विचार परमात्मा के जैसा नहीं है पर लोगों के जैसा है। तब तू ऐसी बात कर रहा है।”

तब येशु जी ने दूसरे लोगों को भी बुलाकर कहा, “जो भी मेरा शिष्य बनना चाहता है, वह अपनी सभी इच्छाओं को छोड़कर मेरे पीछे आ जाये, चाहे इसके बदले तुम्हारे प्राण ही क्यों नहीं चले जायें। क्योंकि जो अपने प्राण को बचाना चाहता है, उनको अमृत जीवन नहीं मिलेगा, लेकिन जो मेरे लिये अपने प्राण को देने के लिये तैयार होगा, उनको अमृत जीवन मिलेगा।

अगर आदमी पूरे संसार को पा ले लेकिन अमृत जीवन को गवा देगा, तब उसको इन बातों से क्या फायदा? क्योंकि जब तुमने अपने अमृत जीवन को एक बार छोड़ दिया तब उसको दुबारा पाने के लिये तुम परमात्मा को कुछ भी नहीं दे सकते हो।

अगर तुम इन कुकर्मी और पापी लोगों के सामने मुझे और मेरी बतायी गईं बातों को अपनाने में शरमाओगे, तो तब, जब मैं अपने पिता की महिमा और पवित्र स्वर्गदूतों के साथ आऊंगा, तब मैं भी तुम को नहीं अपनाऊंगा।”

येशु जी ने ऐसा भी कहा, “मैं तुम से सच कहता हूं कि यहां खड़े हुए लोगों में से कोई ऐसा भी है जो उस समय तक नहीं मरेंगे, जब तक परमात्मा के राज्य को सामर्थ्य के साथ आया नहीं देख लेते।”

मनन और चर्चा करने के लिए कुछ सवाल

1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?

2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?

3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?

4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?

5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?

येशु सत्संग