(मरकुस 9:2-10)
छह दिन के बाद येशु जी अपने शिष्य पारस, जयकर और योहन को लेकर एक ऊंचे पहाड़ के एकान्ट में गये। वहां उनके सामने येशु जी का रूप बदल गया। उनके कपडे़ ऐसे चमकदार और श्वेत हो गए कि धरती में कोई भी धोबी उनको इतना साफ नहीं कर सकते थे। और शिष्यों ने एकदम अपने पूर्वज एलिय्याह और मोशेश को भी वहां देखा, जो येशु जी के साथ बात कर रहे थे।
तब पारस ने येशु जी से कहा, “गुरुजी, यह कितना अच्छा है कि हम भी यहां हैं। हम तीन तम्बू खड़े करते हैं, एक तुम्हारे लिये, एक मोशेश के लिये और एक एलिय्याह के लिये।” उसके समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि हम क्या कहें, क्योंकि यह सब देखकर वे बहुत डर गये थे।
तब एक बादल ने आकर उनको ढक दिया और उस बादल में से परमात्मा की यह आवाज आई, “यह मेरा प्रिय पुत्र है, इसकी बात को मानो!” अचानक जब शिष्यों ने अपनी नजर इधर-उधर डाली, तब उन्होंने वहां येशु जी के अलावा और किसी को नहीं देखा।
जब वे पहाड़ से नीचे आ रहे थे, उस समय येशु जी ने अपने शिष्यों को समझाया, “जो तुमने देखा, उसके बारे में लोगों से तब तक कुछ भी मत कहना, जब तक कि मैं मरे हुओं में से जीवित नहीं हो जाऊँगा।” और उन्होंने इस बात को अपने मन में रखा था, लेकिन वे आपस में बात कर रहे थे कि मरे हुओं में से जीवित हो उठने का क्या अर्थ है?
1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?
2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?
3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?
4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?
5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?