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46. प्रभु येशु प्रेम करना सिखाते हैं

(लूका 10:25-37)

एक दिन येशु जी की परीक्षा लेने के लिये एक धर्म गुरु आया। उसने येशु जी से पूछा, “हे गुरु जी, अमृत जीवन पाने के लिये मैं क्या करूं?”

येशु जी ने कहा, “धर्म-ग्रंथ में क्या लिखा है, तुम उस में क्या पढ़ते हो?” उसने उत्तर दिया, “तू अपने प्रभु परमात्मा से अपने पूरे मन से, पूरी ताकत और पूरी बुद्धि से प्रेम कर और अपने पड़ोसी को भी अपनी तरह प्रेम कर।”

येशु जी ने उससे कहा, “तुम ने ठीक उत्तर दिया। ऐसा ही करो तब तुम जीवित रहोगे।”

लेकिन धर्म गुरु ने अपने को धर्मी बताने के लिये येशु जी से पूछा, “मेरा पड़ोसी कौन है?”

येशु जी ने उत्तर दिया, “एक आदमी था जो यरुशलेम से यरीहो नगर जा रहा था। रास्‍ते में उसको चोरों ने पकड़ लिया। और उसको मार-मारकर अधमरा छोड़ कर उसका सामान लूटकर चले गये। थोड़ी देर बाद एक पुरोहित उस रास्‍ते से जा रहा था, लेकिन वह उसे अनदेखा करके चला गया। इसके बाद परमात्मा के मंदिर में काम करनेवाला एक आदमी भी उस रास्‍ते से गया। लेकिन वह भी उसको अनदेखा करके चला गया। अब एक सामरी जाति का आदमी जिनको सब तुच्‍छ समझते थे उस रास्‍ते से जा रहा था। जब उसने उस अधमरे आदमी को देखा, तब उसको तरस आया। और उसने उसके घावों में दवाई-पट्‍टी बाँधी, और उसको अपने गधे में बैठाकर एक सराय में ले गया और उसकी सेवा की। दूसरे दिन उसने दो चाँदी के सिक्के निकालकर सराय के मालिक को दिये, और उससे कहा, कि तुम इसकी सेवा अच्छे से करना। तुम्हारा जो भी खर्च लगेगा मैं लौटते समय तुम को दे जाऊँगा।”

येशु जी ने धर्म गुरु से पूछा, “उनमें से उस आदमी का सच्चा पड़ोसी कौन था?” उसने उत्तर दिया, “जिसने उस पर तरस खाया।” येशु जी ने कहा, “जाओ, तुम भी ऐसा ही करो।”

सामरी आदमी एक घायल यात्री पर तरस खाता है

मनन और चर्चा करने के लिए कुछ सवाल

1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?

2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?

3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?

4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?

5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?

येशु सत्संग