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62. दिखावा नहीं करना चाहिये

(मरकुस 12:38-44)

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फिर बहुत लोग येशु जी के पास आकर उनकी बात खुश हो कर सुन रहे थे। येशु जी ने उपदेश देकर कहा, “तुम इन धर्म गुरुओं के जैसा मत करना, क्योंकि ये लम्बे कुर्ते पहनकर इधर-उधर घुमते और बाजार में लोग उनको नमस्कार करें, यह इनको अच्छा लगता है। सत्संग भवनों में आगे से बैठना, और निमंत्रण में आदर के स्थान में बैठना, यह सब उनको अच्छा लगता है। लेकिन ये झूठ बोलकर विधवाओं की सारी सम्‍पत्ती खुद ले लेते हैं और फिर लोगों को दिखाने के लिये देर तक प्रार्थना करते हैं! लेकिन इन सब कामों के बदले इनको परमात्मा बहुत बड़ी सजा देंगे।”

फिर येशु जी परमात्मा के मंदिर में जहां दान-पात्र रखा था वहां पर बैठे थे और दान देने वाले लोगों को देख रहे थे। बहुत अमीर लोग अधिक-अधिक दान दे रहे थे। तब एक विधवा ने आकर दो छोटे पैसे दान-पात्र में डाले। यह देखकर येशु जी ने अपने शिष्यों को बुलाकर कहा, “मैं तुम से सच कहता हूं कि दान देने वालों में सब से अधिक इस विधवा ने दिया। क्योंकि सब ने अपनी अधिक कमाई में से थोड़ा दिया, लेकिन इसने अपनी गरीबी में भी इसके पास जितना था सब दे दिया, और अपने लिये कुछ नहीं बचाया।”

मनन और चर्चा करने के लिए कुछ सवाल

1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?

2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?

3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?

4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?

5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?

येशु सत्संग