(मरकुस 12:28-34)
जब एक धर्म गुरु इन बातों को सुन रहा था, तब उसने समझा कि येशु जी ने सदूकियों को सही उत्तर दिया। इसलिये वह आगे बढ़ा और उसने येशु जी से पूछा, “गुरु जी, मुझे बताओ, सब से बड़ी आज्ञा क्या है?”
येशु जी ने कहा, “पहली आज्ञा यह है, ‘हे इस्राएली लोगों, सुनो, हमारा एक परमात्मा हैं और वे हमारे प्रभु हैं। हमें अपने परमात्मा को अपने पूरे मन से, पूरी ताकत और पूरी बुद्धि से प्रेम करना चाहिये।’ दूसरी आज्ञा यह है कि, ‘जैसा प्रेम हम अपने साथ करते हैं, वैसा ही प्रेम हमको अपने पड़ोसी के साथ भी करना चाहिये।’ इन दोनों से बड़ी और कोई भी आज्ञा नहीं है।”
तब धर्म गुरु ने येशु जी से कहा, “हे गुरु जी, कितनी अच्छी बात है। तुम ने सच कहा कि एक ही परमात्मा हैं, उनके अलावा और कोई परमात्मा नहीं है। और हमें उनको अपने पूरे मन से प्रेम करना चाहिये, और जैसा प्रेम हम अपने साथ करते हैं, वैसा ही प्रेम हमको अपने पड़ोसी के साथ भी करना चाहिये। और यह हर प्रकार के बलिदान और भेट चढ़ाने से अधिक जरूरी है।”
जब येशु जी ने देखा कि वह ठीक कह रहा है, तब उन्होंने उससे कहा, “तुम परमात्मा के रास्ते से दूर नहीं हो।”
और इसके बाद किसी को भी और कोई ऐसा सवाल येशु जी से पूछने का साहस नहीं हुआ, जिससे वे येशु जी को फंसाने के इरादे में सफल हों।
1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?
2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?
3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?
4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?
5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?