(मरकुस 14:66-72)
इसी बीच जब पारस आंगन में बैठा था, जब महापुरोहित की एक नौकरानी वहां आई। जब उसने पारस को वहां आग सेकते देखा, तब बहुत ध्यान से उसको देखकर कहा, “तू भी तो उस नासरत गाँव के येशु का साथी हैं।” यह सुनकर पारस ने कहा, “मैं नहीं जानता कि तू क्या कह रही है।” यह कहते-कहते पारस दरवाजे तक पहुंचा था, तब उसी समय मुर्गे ने बांग दी। इसके थोड़ी देर बाद जब उस नौकरानी ने पारस को दुबारा वहां देखा, तब उसने फिर कहा, “यह आदमी भी उनमें से एक है।” पारस ने दुबारा फिर येशु जी का इनकार करके कहा, “नहीं, नहीं, मैं इस आदमी के साथ तो दूर इसे जानता भी नहीं हूं।”
तब थोड़ी देर बाद वहां खड़े हुए लोगों ने पारस से कहा, “यह बात पक्की है कि तू भी येशु के साथियों में से एक हैं, क्योंकि तू भी गलीली हैं। इसका अंदाजा हमने तुम्हारी भाषा से लगाया है।”
उसके बाद पारस उनके सामने परमात्मा की ये कसम खाने लगा, “मैं उस आदमी को नहीं जानता जिसके बारे में तुम कह रहे हो!” उसी समय मुर्गे ने दूसरी बार बांग दी। तब पारस को यह बात याद आई जो येशु जी ने उससे कह रखी थी कि आज मुर्गे के दो बार बांग देने से पहले तू मेरा तीन बार इनकार करेगा। तब पारस को बहुत दुःख हुआ कि मैंने यह क्या किया, और वह जोर-जोर से रोने लगा।
पारस कहता है कि वह प्रभु येशु को नहीं जानता है
1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?
2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?
3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?
4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?
5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?