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41. जो बड़ा होना चाहता है, वह अपने को छोटा बनाये

(मरकुस 9:33-41)

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इसके बाद वे कफरनहूम नगर में आये। घर के अन्दर जाकर येशु जी ने उनसे पूछा, “तुम रास्‍ते में किस बात के बारे में बात कर रहे थे?” लेकिन शिष्य शर्म के मारे चुप रहे, क्योंकि वे रास्‍ते में यह बात कर रहे थे कि उनमें सब से बड़ा कौन है।

तब येशु जी ने सब शिष्यों को बुलाकर उनसे कहा, “अगर कोई बड़ा होना चाहता है, तब वह सब से छोटा बने और सब की सेवा करे।” फिर उन्होंने एक बच्चे को लेकर उनके बीच में खड़ा किया। और उसको गोद में लेकर कहा, “जो मेरे नाम से एक बच्चे का स्वागत करता है, वह मेरा स्वागत करता है। और जो मेरा स्वागत करता है, वह सिर्फ मेरा नहीं बल्कि उनका स्वागत भी करता है जिसने मुझे भेज रखा है।”

फिर उनके शिष्य योहन ने कहा, “गुरु जी, हम ने एक ऐसे आदमी को देखा जो आपके नाम से भूतों को निकाल रहा था, और हमने उसको रोकने की कोशिश की क्योंकि वह हमारी तरह आपका शिष्य नहीं है।” तब येशु जी ने उत्तर दिया, “उस आदमी को तुम मत रोकना, क्योंकि कोई ऐसा नहीं है जो मेरे नाम से सामर्थ्य का काम दिखाये और उसके बाद मेरा निरादर करे। जो हमारे विरोध में नहीं है, वह हमारी ओर है।

हां, ऐसा भी है कि अगर मेरे शिष्य होने के कारण कोई तुमको एक गिलास पानी भी पिलाए, तब परमात्मा उसे उसका इनाम जरूर देगा।”

मनन और चर्चा करने के लिए कुछ सवाल

1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?

2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?

3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?

4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?

5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?

येशु सत्संग