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49. अपने को बड़ा नहीं समझना चाहिये

(लूका 18:9-14)

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इसलिये कि कुछ लोग अपने को धर्मी मानते हैं, और दूसरों को नीच समझते हैं, उनके लिये येशु जी ने यह किस्सा सुनाया।

“दो आदमी प्रार्थना करने के लिये परमात्मा के मंदिर में गये। उन में से एक धर्म गुरु था और दूसरा चुंगी लेने वाला था। और धर्म गुरु खड़े-खड़े ऐसी प्रार्थना कर रहा था, “हे परमात्मा, मैं आप को धन्यवाद देता हूं कि मैं दूसरे लोगों के जैसे चोर, अन्यायी, कुकर्मी नहीं हूं और ना इस चुंगी लेने वाले के जैसा हूं। मैं सप्ताह में दो बार उपवास रखता हूं और अपनी पूरी कमाई में से दान भी देता हूं।”

लेकिन चुंगी लेने वाला आदमी थोड़ी दूर में खड़ा था और उसको शर्म से स्वर्ग की ओर आँख उठाने की हिम्मत भी नहीं हो रही थी। और उसने अपनी छाती पीट-पीटकर कहा, “हे परमात्मा, मुझ पापी पे दया कीजिये!”

येशु जी ने कहा, “मैं तुम से कहता हूं कि उस धर्म गुरु के नहीं बल्कि चुंगी लेने वाला पाप माफ हो कर अपने घर गया। क्योंकि जो कोई भी अपने को बड़ा समझता है, वह छोटा करा जायेगा। लेकिन जो अपने को छोटा समझता है, वह बड़ा करा जायेगा।”

मनन और चर्चा करने के लिए कुछ सवाल

1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?

2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?

3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?

4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?

5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?

येशु सत्संग