(मरकुस 10:35-45)
चलते-चलते शिष्यों में से दो भाई, जयकर और योहन ने येशु जी से कहा, “गुरु जी, हम चाहते हैं कि जो कुछ भी हम आप से मांगे, आप उसे पूरा करोगे।” तब येशु जी ने उन से कहा, “तुम क्या चाहते हो? मैं तुम्हारे लिये क्या करूं?” उन्होंने कहा, “जब आप राजा बनोगे, तब हमको सब से बड़े पद में बैठाकर अपने दाहिने और बाएं ओर बैठने की आज्ञा देना।” येशु जी ने उन से कहा, “तुम नहीं जानते कि तुम क्या मांग रहे हो। जो दुःख मैंने सहना है, क्या तुम उसको सह पाओगे? जो अत्याचार मुझे सहना है, क्या तुम उसको सह पाओगे?” उन्होंने उत्तर दिया, “हां, हम सह सकते हैं।” येशु जी ने कहा, “जो दुःख और अत्याचार मुझे सहन करना है, सचमुच वह तुम भी सहोगे। लेकिन तुम को अपने दाहिने या बाएं ओर बैठाना मेरा काम नहीं है, क्योंकि यह स्थान उनका है, जिनके लिये परमात्मा ने यह तैयार किया है।”
जब बाकी दस शिष्यों को इस बात का पता चला कि जयकर और योहन बड़ा बनने कि बात कर रहे थे, तब वे उनको देखकर नाराज हुए। लेकिन येशु जी ने सब शिष्यों को अपने पास बुलाकर कहा, “तुम जानते हो कि जो इस दुनिया में अधिकारी माने जाते हैं, वे अपनी जनता में अपने मन का राज्य करते हैं। लेकिन तुम जो मेरे पीछे आ रहे हो तुम में ऐसी बात नहीं होनी चाहिये। जो तुम में बड़ा होना चाहता है, वह सब का सेवक बने। और जो तुम में प्रधान होना चाहता है, वह सब का दास बने। वैसे ही मैं परमात्मा की ओर से इसलिये नहीं आया कि मैं लोगों से अपनी सेवा कराऊं, बल्कि इसलिये आया कि मैं खुद सब लोगों की सेवा करूंगा और बहुतों के मोक्ष के लिये अपने लहू को पानी की तरह बहा दूं।”
1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?
2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?
3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?
4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?
5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?