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53. यरुशलेम में प्रभु येशु का स्वागत

(मरकुस 11:1-11)

जब येशु जी और उनके शिष्य यरुशलेम से थोड़ा पहले बैतनियाह गाँव में पहुंचे, तब येशु जी ने दो शिष्यों को यह कहकर भेजा, “उस सामने के गाँव में जाओ। वहां जाते ही तुम को एक खूंटी में बंधा गधे का बच्चा मिलेगा, जिसमें अभी तक कोई नहीं बैठा है। तुम उसको खोलकर यहां लाना। और अगर कोई कहेगा, “इसे क्यों ले जा रहे हो?”, तब तुम उससे कहना कि हमारे प्रभु को इसकी जरूरत है। वे इसे जल्दी वापिस पहुंचा देंगे।”

शिष्य चले गये और उन्होंने गधे के बच्चे को सड़क के किनारे पर एक घर के बाहर से बंधा पाया। जब वे उसको खोलने लगे तब वहां पर खड़े लोगों ने पूछा, “हे क्या कर रहे हो, तुम इस गधे के बच्चे को क्यों ले जा रहे हो?” येशु जी ने उनको जैसा बताया था, शिष्यों ने उन लोगों से वैसा ही कहा। तब उन लोगों ने शिष्यों को जाने दिया।

वे गधे के बच्चे को येशु जी के पास ले गये और उसपे अपनी चादर बिछा दी। फिर येशु जी उसपे बैठे और इस प्रकार येशु जी यरुशलेम गये। तब बहुत लोगों ने रास्‍ते में अपने-अपने कपड़े और चादर बिछा दिये। और कुछ लोगों ने खेतों में से हरी-हरी टहनी काट कर रास्‍ते में येशु जी के स्वागत के लिये बिछा दिये। और लोग येशु जी के साथ आगे-पीछे चलते-चलते चारों ओर से यह जय-जयकार कर रहे थे, “धन्य हो तुम जो प्रभु के नाम से आ रहे हो! जैसा हमारे पूर्वजों के राजा दाविद थे, वैसे ही अभी तुम हमारे राजा होंगे! तुम्हारी जय हो! परम स्वर्ग में परमात्मा की तारीफ हो!”

फिर येशु जी यरुशलेम नगर में पहुंचे, और वहां परमात्मा के मंदिर में गये। वहां सब कुछ अच्छे से देखकर अपने बारह शिष्यों के साथ फिर वापिस रात बिताने के लिये बैतनियाह गाँव में आये।

यरुशलेम में प्रभु येशु का स्वागत

मनन और चर्चा करने के लिए कुछ सवाल

1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?

2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?

3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?

4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?

5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?

येशु सत्संग