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54. प्रभु येशु परमात्मा के मंदिर से व्यापारियों को निकालते हैं

(मरकुस 11:12-19)

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दूसरे दिन जब येशु जी और उनके शिष्य बैतनियाह से यरुशलेम की तरफ जा रहे थे, तब रास्‍ते में चलते-चलते येशु जी को भूख लगी। तब कुछ दूर से वे एक अंजीर के हरे-भरे पेड़ को देखकर उसके पास आये कि शायद खाने के लिये कुछ मिल जाये। येशु जी पेड़ के पास गये पर उन्होंने वहां पत्तों के अलावा और कुछ भी नहीं पाया, क्योंकि अभी फल का समय नहीं था। तब येशु जी ने कहा, “जा, आज से तुझ में कभी फल नहीं लगेंगे!”

इसके बाद येशु जी और उनके शिष्य यरुशलेम आये और येशु जी परमात्मा के मंदिर में गये। वहां जो लोग आंगन में बैठकर व्यापार कर रहे थे और भेट-बलिदान चढ़ाने के समान बेच रहे थे, येशु जी उनको वहां से बाहर निकालने लगे। और उन्होंने उनकी मेजों को फेंक दिया, और किसी को भी समान ले कर परमात्मा के घर के आंगन के रास्‍ते नहीं जाने दिया। फिर येशु जी ने लोगों को डांट कर कहा, “धर्म-ग्रंथ में ऐसा लिख रखा है, “मेरा घर सब जातियों के लोगों के लिये प्रार्थना का घर कहलाया जाएगा।” पर तुम ने इसे प्रार्थना का घर नहीं बल्कि लुटेरों का अड्डा बना रखा है!”

इस कारण से पुरोहितों के साहब और धर्म गुरुओं ने येशु जी को मारने के बारे में उपाय सोचा। उनको येशु जी को देखकर डर भी लगता था, क्योंकि दूसरे लोग चकित हो कर बहुत खुशी से येशु जी की बातें सुन रहे थे।

और शाम के समय येशु जी और शिष्य नगर से बाहर बैतनिया गाँव में वापिस चले गये।

प्रभु येशु मंदिर में से लुटेरों को भगाते हैं

मनन और चर्चा करने के लिए कुछ सवाल

1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?

2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?

3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?

4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?

5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?

येशु सत्संग