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56. धर्म गुरु प्रभु येशु को ललकार करते हैं

(मरकुस 11:27-33)

फिर येशु जी यरुशलेम में आकर परमात्मा के मंदिर के आंगन में घूम रहे थे। उस समय धर्म गुरु, पुरोहितों के साहब और प्रधान उनके पास आये। और उन्होंने येशु जी से सवाल पूछा, “जो तुम ने कल यहां आकर किया, वह क्यों किया और किसके कहने में तुम यह काम करते हो?”

तब उनको उत्तर देने के लिये येशु जी ने कहा, “मैं भी तुम से एक सवाल पूछता हूं, और अगर तुम मुझे इसका उत्तर दोगे, तब मैं तुम को बताऊंगा कि मैं किसके कहने में यह काम कर रहा हूं। अब तुम ये बताओ कि गुरु योहन किसके कहने में लोगों को जल दीक्षा देते थे - परमात्मा के कहने में या लोगों के कहने में? तुम मुझे इसका उत्तर दो।”

तब वे लोग आपस में ये बात करने लगे, “अगर हम कहे, परमात्मा के कहने में, तब येशु जी कहेंगे कि फिर तुम ने गुरु योहन में विश्वास क्यों नहीं रखा। लेकिन अगर हम कहें लोगों के कहने में, तब लोग सुनकर गुस्सा करेंगे, क्योंकि वे गुरु योहन को परमात्मा का सेवक समझते थे।”

इसलिये उन्होंने येशु जी से कहा, “हमको पता नहीं है।” तब येशु जी ने कहा, “मैं भी तुम को नहीं बताऊंगा कि मैं किसके कहने में यह काम कर रहा हूं।”

मनन और चर्चा करने के लिए कुछ सवाल

1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?

2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?

3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?

4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?

5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?

येशु सत्संग