(मरकुस 14:17-26)
जब शाम होने लगी तब येशु जी अपने बारह शिष्यों के साथ उस घर में पहुंचे जहां त्यौहार खाने के लिये तैयारी कर रखी थी। और जब वे खाना खा रहे थे, तब येशु जी ने उनसे कहा, “तुम सब मेरे साथ खा रहे थे, लेकिन मैं सच कहता हूं कि तुम में एक ऐसा है जो मुझे पकड़वायेगा।” येशु कि यह बात सुनकर शिष्य उदास हो पड़े और एक-एक करके उनसे पूछने लगे कि कही वह मैं तो नहीं हूं? येशु जी ने उत्तर दिया, “सच में तुम सब मैं से एक मुझे पकड़वायेगा, जो अभी मेरे साथ खाना खा रहे हो। मैं जो परमात्मा की ओर से आया हूं, मेरा हाल तो वैसा ही होगा, जैसा मेरे बारे में लिख रखा है, लेकिन धिक्कार है उस आदमी के लिये जो मुझे पकड़वायेगा। इस से अच्छा उसके लिये यह था कि वह आदमी पैदा ही नहीं होता।” जब वे खाना खा रहे थे उस समय येशु जी ने रोटी पकड़ी और आशीष मांगकर तोड़ी और अपने शिष्यों को देकर कहा, “लो, यह रोटी है जिसको तुम मेरा तन समझ कर खाना।” फिर उन्होंने कटोरे को उठाकर परमात्मा को धन्यवाद देकर उनके शिष्यों को दिया और सब ने उस में से बारी-बारी से पिया। उन्होंने कहा, “तुम जो यह अंगूर का लाल रस पी रहे हो इसको मेरा खून समझना जिसको मैं बहुत लोगों की जान को बचाने के लिये बहानेवाला हूं। क्योंकि मेरी मौत से परमात्मा लोगों के साथ अपना एक नये वायदे को साबित कर रहे हैं। मैं तुम से सच कहता हूं कि मैं अंगूर का रस तब तक दुबारा कभी नहीं पीऊँगा, जब तक कि मैं परमात्मा के राज्य में जाकर न पी लूं।”
तब भजन गाने के बाद येशु जी और उनके शिष्य जैतून नाम के पहाड़ पर चले गये।
प्रभु येशु अपने शिष्यों के साथ अंतिम भोज करते हैं
1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?
2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?
3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?
4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?
5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?