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69. प्रभु येशु दुःखी हो कर प्रार्थना करते हैं

(मरकुस 14:32-42)

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येशु जी और शिष्य गतसमनी नाम के बगीचे में आये। येशु जी ने अपने शिष्यों से कहा, “जब तक मैं प्रार्थना करता हूं, तुम यहां रुको।”

येशु जी पारस, जयकर और योहन को अपने साथ ले गये। उस समय येशु जी बहुत उदास और घबराये थे। उन्होंने शिष्यों से कहा, “मैं इतना अधिक दुःखी हूं कि मुझे ऐसा लग रहा है कि मेरे प्राण जाने वाले हैं। इसलिये तुम यहां रुको और सोना मत।”

वे थोड़ा आगे गये और जमीन में गिरकर प्रार्थना करने लगे कि अगर हो सके तब यह मुसीबत मेरे सामने से टल जाये। उन्होंने कहा, “हे पिता, तुम्हारे लिये कुछ भी मुश्किल नहीं हैं। यह दु:ख-मुसीबत कि असहनीय पल को मुझ से दूर कर दीजिये। फिर भी मेरी नहीं, बल्कि तुम्हारी इच्छा पूरी हो।”

फिर येशु जी अपने शिष्यों के पास वापिस आये और उन्होंने उनको सोया देखकर पारस से कहा, “हे शमौन पारस, क्या तू सो रहा है? क्यों तू घंटाभर भी उठा नहीं रह सकता था? तुम सभी उठे रह कर प्रार्थना करो कि तुम परीक्षा में ना पड़ो। तुम्हारी आत्मा तो अच्छा करने के लिये तैयार है, लेकिन तुम्हारे पास यह शक्ति नहीं है कि तुम आत्मा की बात को पूरा कर सको।”

उन्होंने फिर जाकर दुबारा वही प्रार्थना की जो उन्होंने पहले की थी। वापिस आने पर उन्होंने अपने शिष्यों को और सोया हुआ पाया क्योंकि उनकी आँखों में नींद भरी थी। उठकर शिष्यों के समझ में यह नहीं आया कि वे येशु जी को क्या उत्तर दें।

येशु जी जब तीसरी बार शिष्यों के पास आये, तब उन्होंने उन से कहा, “अभी तक सोये हुए हो और आराम ही कर रहे हो? बस, अब बहुत हो गया है। वह समय आ गया है कि मैं जो परमात्मा के तरफ से आया हूं पापियों के हाथ पकड़ाया जा रहा हूं। उठो, हम चलते हैं, क्योंकि मेरा पकड़वाने वाला नजदीक आ गया है।”

प्रभु येशु बगीचे में प्रार्थना करते हैं

मनन और चर्चा करने के लिए कुछ सवाल

1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?

2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?

3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?

4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?

5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?

येशु सत्संग