(मरकुस 1:4-11, मत्ती 3:13-17)
येशु जी के जवान होने के बाद, इस से पहले कि वे परमात्मा का काम शुरु करते, योहन नाम का एक आदमी प्रचार करने लगा। वह रेगिस्तान में रहता, और ऊंट के रोओं के सादे और झर-झरे कपडे़ पहनता, और खाने के लिये वन मधु और टिड्डियों का प्रयोग करता था।
वह इसलिये आया कि वह ज्योति देनेवाले मुक्तिदाता के बारे में बताये और सब लोग उसके द्वारा विश्वास भी करें। वह खुद तो ज्योति देनेवाले नहीं था, पर केवल उस के बारे में गवाही देने के लिये आया था, जिनकी सच्ची ज्योति हरेक आदमी पर चमकती रहती है।
उसने यह भी कहा, “अधर्म के रास्ते को छोड़ कर अपने को धर्म के रास्ते में चलने के लिये मन फिराओ और जल दीक्षा लेकर शुद्ध हो जाओ।” सारे यहूदा प्रदेश और सभी यरुशलेम में रहने वाले लोग उसके पास आने लगे, और उसकी बात सुनकर बहुत लोगों ने दुःखी होकर कहा कि हम पापी हैं, और उन्होंने उसके हाथ से यर्दन नदी में जल दीक्षा लेकर दिखाया कि हम मन फिराते हैं।
उसने कहा, “मेरे बाद एक दूसरा आदमी आने वाले हैं, और वे मुझ से इतने अधिक बड़े हैं कि मैं इस लायक भी नहीं हूं कि झुककर उनके जूते के फीते को खोल सकूं। मैंने तो तुम को जल दीक्षा से शुद्ध किया, पर वे तुम को ईश-आत्मा से शुद्ध कराएंगे!”
उसी समय येशु जी भी गुरु योहन के हाथ से जल दीक्षा लेने के लिये नदी के किनारे में पहुंचे। गुरु योहन ने यह कहकर उनको रोकना चाहा, “मुझे तो आपके हाथ से जल दीक्षा लेने की जरूरत है, और आप मेरे पास आये हैं?” लेकिन येशु जी ने उनको उत्तर दिया, “अभी ऐसा ही होने दो, क्योंकि यहीं परमात्मा की इच्छा है।” यह सुनकर गुरु योहन ने येशु जी की बात मान ली।
जब येशु जी पानी से बाहर निकले, उसी समय उनके लिये स्वर्ग खुल गया और उन्होंने ईश-आत्मा को कबूतर की तरह अपने में उतरते देखा। और स्वर्ग से यह आवाज सुनायी दी, “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं बहुत खुश हूं!”
गुरु योहन प्रभु येशु को जल दीक्षा देते हैं
1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?
2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?
3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?
4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?
5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?