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80. शिष्यों के साथ प्रभु येशु की मुलाकात और खाना

(योहन 20:19, लुका 24:37-45)

इसके बाद जब शाम के समय चेले यहूदियों के नेताओं के डर से घर के अन्दर कुण्डी लगाकर बातें कर रहे थे, तब अचानक येशु जी उनके बीच में आये और उनसे कहा, “तुम को शांति मिले!” वे येशु जी को देखकर चकित हो कर सोचने लगे कि कहीं यह कोई भूत तो नहीं है? येशु जी ने उनसे कहा, “तुम सारे क्यों डर रहे हो? तुम को भ्रम क्यों हो रहा है? मेरे हाथ और पाँव देखो, मैं हूं। मुझ में हाथ लगाकर देखो कि मैं ही हूं, क्योंकि भूत में हड्डियां और मांस नहीं होता है, जैसा तुम मुझ में देख रहे हो।” ऐसा कहकर येशु जी ने अपने हाथ और पाँव दिखाये।

यह सब देखकर उनको आनंद के मारे विश्वास नहीं हो रहा था और वे दंग होकर देखते रह गये। तब येशु जी ने कहा, “क्या तुम्हारे पास यहां खाने के लिये कुछ है?” उन्होंने उसे मछली का एक टुकड़ा दिया, और येशु जी ने उनके सामने यह खाया।

फिर येशु जी ने उनसे कहा, “जब मैं तुम्हारे साथ था, तब मैंने कह रखा था, कि धर्म-ग्रंथ में मेरे बारे में जो भी लिख रखा है, उसका पूरा होना पक्का है।” येशु जी ने उनको समझाया कि परमात्मा के वचन के अनुसार मुक्तिदाता को अपनी महिमा के पद मिलने से पहले बहुत दु:ख-मुसीबत उठा कर मरना और तीसरे दिन फिर जीवित होना आवश्यक है। और यह सब कहने के बाद उनके सामने से येशु जी चले गये।

प्रभु येशु अपने शिष्यों के साथ खाना खाते हैं

मनन और चर्चा करने के लिए कुछ सवाल

1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?

2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?

3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?

4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?

5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?

येशु सत्संग