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81. शिष्यों के साथ फिर प्रभु येशु की मुलाकात होती है

(योहन 21:3-14)

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इसके कुछ समय बाद पारस ने दूसरे साथियों से कहा, “मैं मछली पकड़ने के लिये जाता हूँ।” उन्होंने कहा, “हम भी तुम्हारे साथ चलते हैं।” तब वे मछली पकड़ने के लिये नाव में चढ़े और सारी रात जाल डाला, लेकिन एक भी मछली नहीं मरी।

सुबह होते समय येशु जी समुद्र के किनारे में आये, लेकिन शिष्यों ने उनको नहीं पहचाना कि वे येशु जी हैं। येशु जी ने उनसे कहा, “साथियों, तुम्हारे पास खाने के लिये कुछ है?” उन्होंने उत्तर दिया, “हमारे पास कुछ भी नहीं है।” तब येशु जी ने उनसे कहा, “नाव के दाहिनी ओर अपने जाल डाले, तब तुम को मछली मिलेगी।” तब उन्होंने अपने दाहिने ओर जाल डाला और उसमें इतनी अधिक मछली लगी कि वे जाल को भी नहीं खींच सके।

तब योहन ने पारस से कहा, “ये तो प्रभु हैं!” यह सुनकर पारस ने जल्दी कुर्ता पहना क्योंकि उसने वह उतार रखा था। और वह येशु जी के पास जाने के लिये पानी में कूद पड़ा। दूसरे चेले मछलियों से भरे जाल को खींचकर किनारे में ले गये। किनारे में आकर उन्होंने कोयले में मछली और रोटी रखी देखी। तब येशु जी ने उनसे कहा, “तुम ने अभी जो मछली पकड़ रखी है, उनमें से थोड़ी लाओ।” पारस नाव में चढ़कर जाल को किनारे में खींच लाया। जाल में एक सौ तिर्पन बड़ी मछली थी, इतनी मछली उस जाल में होने पर भी वह न फटी।

तब येशु जी ने उनसे कहा, “आओ, अभी खाना-पीना खा लो।” शिष्यों में से किसी को यह पूछने की हिम्मत भी न हुई कि आप कौन हैं? वे जानते थे कि वे प्रभु हैं।

इसके बाद येशु जी ने उनको रोटी और मछली खाने के लिये दीं।

समुद्र के किनारे पर प्रभु येशु अपने शिष्यों से मिलते हैं

मनन और चर्चा करने के लिए कुछ सवाल

1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?

2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?

3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?

4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?

5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?

येशु सत्संग