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82. पारस को प्रभु येशु माफ करते हैं

(योहन 21:15-17)

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खाना खाने के बाद येशु जी ने शमौन पारस से कहा, “शमौन, योहन के पुत्र, क्या तू इनसे अधिक प्रेम मुझे करता है?” उसने उत्तर दिया, “प्रभु, आप जानते हैं कि मैं आप को प्रेम करता हूं।” उन्होंने कहा, “मेरे बच्चों की देख-भाल कर।”

येशु जी ने फिर दूसरी बार उससे कहा, “शमौन, योहन के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम करता है?” उसने कहा, “प्रभु, आप स्वयं जानते हैं कि मैं आप से प्रेम करता हूं।” येशु जी ने कहा, “तब तू मेरे लोगों की देख-रेख कर।”

येशु जी ने फिर तीसरी बार कहा, “शमौन, योहन के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम करता है?” यह सुनकर पारस को बहुत दुःख हुआ कि येशु जी ने उससे तीसरी बार यह पूछा कि तू मुझ से प्रेम करता है? उसने फिर यह उत्तर दिया, “प्रभु, आप सभी जानते हैं, आप को पता है कि मैं आप से प्रेम करता हूं!” फिर येशु जी ने उससे कहा, “मेरे लोगों की देख-भाल कर।”

(येशु जी ने पारस से तीन बार पूछा कि क्या तू मुझ से प्रेम करता है, क्योंकि पारस ने पहले येशु जी का तीन बार इनकार कर दिया था। लेकिन येशु जी ने उसका इनकार नहीं किया और उसे माफ किया, और उसे बताया कि तू फिर भी मेरी सेवा कर सकता है।)

प्रभु येशु पारस से कहते हैं कि मेरे लोगों की देखभाल करो

मनन और चर्चा करने के लिए कुछ सवाल

1) इस वचन में आपको क्या अच्छा लगा? क्या पसंद नहीं आया?

2) इस वचन से आप परमात्मा के बारे में क्या सीखते हैं?

3) इस वचन से आप मनुष्यों के बारे में क्या सीखते हैं?

4) इस वचन से हमें अपने जीवन में क्या पालन करना चाहिए?

5) इस वचन को आप किस के साथ बाँटेंगे और कब?

येशु सत्संग